Friday, May 1, 2020

तुम शायद जादूगरनी ही थी, हज़रत बाबजान!

साल 2014 था शायद वो। ये वो समय था जब मुझे अपने बारे में नयी बातें पता चल रही थीं और पुरानी बातें समझ में आने लगी थीं। मास्टर्स के आखिरी सेमिस्टर की रिसर्च के लिए पुणे जाना तय हुआ था। अभी 2 से 3 महीने का वक्त बाकी था और मैं सेम ब्रेक में घर गयी थी।

यहां से आगे पढ़ने से पहले ये जानना बेहद ज़रूरी होगा कि एक इंसान के तौर पर मुझे सपने बेहद डिटेल में आते हैं। छुटपन में देखे हुए कई सपने मुझे वाज़े तौर पर याद हैं और कई सपने उम्र के अलग-अलग पड़ावों में सीक्वल्स की तरह भी चले हैं।

तो ये वाकया है एक ऐसी रात का जब मैंने सपने में एक बूढ़ी औरत को देखा। सपना कुछ ऐसा था कि उस बूढ़ी महिला का एक छोटा सा कमरा था। उस कमरे से एक दरवाज़ा अंदर को जाता था। दरवाज़े की ऊंचाई एक औसत इंसान की कमर जितनी होगी। उस छोटे से दरवाज़े के अंदर एक बहुत बड़ा हॉल था जहां लोग किसी नाटक की प्रैक्टिस कर रहे थे। उस बड़े से हॉल में एक स्टेज था और पूरे हॉल में पर्दे और प्रॉप फैले हुए थे।

अपने सपने में मैं एक पर्दे को लपेटकर सो रही थी। पीछे का शोर मुझे सुनाई दे रहा था लेकिन मैं उठना नहीं चाह रही थी। इतने में वो बूढ़ी महिला लाठी टेकती हुई मेरे पास आयी और उसी लाठी से मुझे हिलाते हुए उठाने लगी।

उस महिला ने एक बड़ा सा काला चोंगा पहना हुआ था जो उसके कंधे से टखने तक का था। बाल पूरे सफ़ेद, घुंघराले और बिखरे हुए थे। मुझे देखकर बहुत प्यार से बोली, ‘कितना वक्त लगाओगी मुझसे मिलने आने में? मैं कब से इंतज़ार कर रही हूं।’ मुझे उस पल में ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे भीतर कुछ पिघल रहा था और मैं बस उस औरत से लिपटकर बुक्के फाड़ कर रोना चाहती थी।

 मैं कुछ बोल पाती, इससे पहले किसी ने उसे आवाज़ लगायी, ‘बाबा, आपसे कोई मिलने आया है, बैठक में।’ इसके बाद कुछ एक्टर्स बैकग्राउंड में डायलॉग बोलते रहे और कुछ रैंडम चीज़ें हुईं सपने में।

लेकिन उस महिला की आवाज़ मेरे कानों में सुबह उठने के बाद भी गूंजती रही। मैंने लैपटॉप उठाकर रैंडमली दो शब्द सर्च बार में टाइप किये, ‘बाबा, पुणे’. तमाम ऑप्शंस के बाद मुझे चौथे या पांचवे पेज पर एक तस्वीर नज़र आयी। ये लिखते हुए आज भी मेरे हाथ काँप रहे हैं। वो तस्वीर मेरे सपने वाली उस औरत की थी और नाम लिखा था, ‘हज़रत बाबजान’

Credit: Wikipedia Open Source 

उस दिन से पहले तक ना मैं पुणे में 10 दिन से ज़्यादा कभी रही थी, ना मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इस महिला को कभी देखा था, ना ही मैंने कभी ये नाम सुना था। थोड़ा पढ़ा तो समझ में आया कि हज़रत बाबाजान बलूचिस्तान में जन्मी एक बंजारी संत थीं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के आखिरी 25 साल पुणे में बिताये थे। पुणे के कैंप एरिया में उनकी दरगाह है। मैंने तय किया कि पुणे जाते ही मैं उनकी दरगाह पर ज़रूर जाउंगी।

पुणे पहुंचकर काम का प्रेशर जो पड़ा मैं रात-दिन भूल गयी। ऐसे में हज़रत बाबाजान भी दिमाग से उतर गयीं। 6 महीने में डेज़र्टेशन पूरा हुआ और रिसर्च वर्क शुरू होने में एक महीने का खाली समय था। इस दौरान मैंने तय किया कि मैं बाबजान की दरगाह पर जाउंगी। पुणे में रहने वाले बहुत से लोग बाबाजान के बारे में कुछ नहीं जानते। फिर भी पूछते, खोजते मैं दरगाह तक पहुंची। दरगाह के सामने खड़े होते ही मुझे थोड़ा डर लगा। मैं सोच ही नहीं पा रही थी कि अंदर मुझे क्या महसूस होगा और वहां से वापस आकर मैं क्या बन चुकी होउंगी।

मैं अंदर पहुंची। उनकी दरगाह का वो छोटा सा आयताकार कमरा मेरे सपने की उस बैठक से कुछ-कुछ मिलता था, जहां से उस रोज़ किसी ने बाबाजान को आवाज़ दी थी। पीछे एक बड़ा हॉल था जहां उर्स वगैरह का आयोजन होता है।

मैं बहुत शांत थी। जाने कितने घंटे मैं वहीं एक दीवार से टेक लगाए बैठी रही। बहुत बहुत शांति थी वहां। सिर टेकते हुए मैंने अपना तार्रुफ़ कराया, ‘लो आ गयी तुमसे मिलने बाबजान।’ उस पल मुझे ऐसा लगा मैं किसी ऐसे शख्स से मिल रही हूं जिसके साथ मैने लंबी खमोशियों का दौर जिया है। जैसे एक दोस्त जिसके साथ घन्टों बिना कुछ बोले सिगरेट के कश लेते हुए ढलती शाम देखी हो। ऐसी इन्टीमसी शब्दों से नहीं बनी कभी मेरे लिये। मेरी आंखे वहां बैठे-बैठे झरझर बहती रही। ये वो आंसू थे जो किसी अपने को बाहों में भींचकर दुलारने में बहते हैं।

बाबजान के बारे में खूब पढ़ा। फिर बिल्कुल भी नहीं पढ़ा। 95 साल की वो औरत, बलूचिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते भारत पहुंची। यहां आकर भी उसने पुणे में रहना चुना। झुके कंधे, बिखरे बाल, एक लम्बा चोंगा पहने इस औरत को लोगों ने चुड़ैल और जादूगरनी कहा। जादूगरनी तो वो रही होगी, वर्ना कैसे उसने इतनी दूर से मुझे मिलने बुला लिया, वो भी मेरे उस दौर में जब मैं बाल बिखेरे, लंबा चोंगा पहने गली-गली घूमने से बस एक कदम दूर थी! 

तुम शायद जादूगरनी ही थी, हज़रत बाबजान!

साल 2014 था शायद वो। ये वो समय था जब मुझे अपने बारे में नयी बातें पता चल रही थीं और पुरानी बातें समझ में आने लगी थीं। मास्टर्स के आखिरी सेम...